Sunday, 12 February 2012

'प्रेम का मौलिक अधिकार' - Valentine's Special




नए ज़माने ने जो अधिकार आम-आदमी को सुलभ कराए उनमे से एक 'प्रेम का मौलिक अधिकार' भी था। वर्ना एक वक़्त था जब इश्क-मोहब्बत राजा, रजवाड़ो और बादशाहों के शगूफ़े माने जाते थे, या यूँ कह लीजिये कि उस ज़माने में ये Page 3 Material था। आम आदमी ने तो तब तक प्यार करना सीखा ही नहीं था। वह तो ग़दर, हरित क्रांति, औघोगिक क्रांति में ही उलझा रहा। प्रेम क्रांति की तरफ उसका ध्यान जाने ही नहीं दिया गया ।
आज हालात बदल चुके हैं, इश्क़ महलों से निकल कर गलियों से होता हुआ घरों के छज्जे तक पहुँच गया है, और प्रेम के इस विस्तार की गति इतनी तीव्र थी कि - क्या कॉलेज - क्या कार्यालय सबको सामान अधिकार प्रदान किया, यानी Equal Opportunity for All. आज जब प्यार करने का मौलिक अधिकार सबकी जेब में खनखना रहा है तो इस प्रेम के सशक्तिकरण को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाने के लिए एक दिन भी सुनिश्चित कर लिया गया है। नाम दिया गया है - Valentine's Day.  अब यह St Valentine’s कौन थे, हमारे देश में हुई प्रेम क्रांति में इनका क्या योगदान था, इन सवालों में मत उलझिए, कहा ना - यह सिर्फ एक प्रतीक हैं। और अंग्रेजी नाम से यह मत समझियेगा की concept विदेश से चुराया गया है- बिलकुल भी नहीं साहब ! हाँ बस थोड़ी inspiration ली है।
खैर, नाम में क्या रखा है अगर Valentine's दिवस, संत Valentine के नाम पर न होकर 'संत बैजनाथ दिवस' होता तो क्या कोई फर्क पड़ता? तारीख चाहे बदल भी जाती मगर साउथ एक्स के अंसल प्लाज़ा में तब भी बैठने की जगह ना मिलती, लखनऊ के अमीनाबाद में पुलिस तब भी तैनात होती और मुंबई के जुहू-चौपाटी पर तब भी भुट्टे जोड़े में ही बिकते। बहरहाल, विषय पर वापस आते हैं हम बात कर रहे थे - 'प्रेम के सामाजिक संघर्ष की' आज समाज में जहाँ नयी पीढ़ी में 'प्रेम के प्रति जागरूकता' कूट-कूट के भरी है और वातावरण काफी love-friendly है, तो इसका श्रेय उन तमाम प्रेम-क्रांतिकारियों को जाता है जिन्होंने इस संघर्ष की राह में अपनी जानें तक कुर्बान कर दीं। इस फेहरिस्त में सबसे ऊपर नाम आता है लैला-क़ैस का (क़ैस, जिन्होंने बाद में मजनूं के नाम से ख्याति प्राप्त की)। ये वही युगल थे जो बाद में इस क्रांति के अग्रदूत बने। कहते हैं, आदमी मर जाता है उसके विचार नहीं - यही वजह है की लैला-मजनूं की कुर्बानी के बाद उनके विचारों का बीज समाज में पनपता रहा जिसे बाद में हमने पर्दे पर देखा। आज के सामाजिक परिवेश में सभी के लिए 'प्रेम के सामान अवसर' मौजूद हैं और यह इसलिए सामान हैं क्योंकि सभी को सामान रूप से 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' प्रदान की गयी है। आज कोई भी इस विचारधारा वाला व्यक्ति अपने प्यार का इज़हार कर सकता है, वो स्वतंत्र है अपने विचारों को सामने वाले/वाली को अभिव्यक्त करने के लिए।
वर्तमान सामाज में प्रेम-विचारधाराको पनपने के अनुकूल साधन भी सुलभ कराए गए हैं । आज कबूतरों के गले में चिट्ठियाँ बाँध कर भेजने का रिस्क लेने की आवश्यकता नहीं रही। अरे भई! जानवर आखिर जानवर है। मेरा ख़याल है कबूतरों के ग़लत हाथों में चिट्ठियाँ पहुंचा देने पर, कभी इसके बहुत भयंकार परिणाम हुए होंगे, जिसके कारण इस प्रथा पर रोक लगा दी गयी होगी। लेकिन इश्किया-इन्किलाब की आग की तपिश ने 'आवश्यकता आविष्कार की जननी है' वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए - एक सस्ता और सुरक्षित विकल्प ढूंढ निकाला, नाम दिया – Mobile. यह यन्त्र इसलिए भी कारगर था क्योंकि इसमें प्रेम के नाज़ुकपन को समझने की सलाहियत थी और यही वजह थी की इससे, वह बातें जो बोली नहीं जा सकती थीं उन्हें सन्देश रूप में लिख कर भेजने की सुविधा से भी लैस किया गया। जैसा कि मैं पहले भी बता चुका हूँ कि समाज ने प्रेम-विचारधाराके प्रचार प्रसार के लिए एक अनुकूल वातावरण बनाया, इसी विषय में mobile companies के सहयोग को भी नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता। ये उनकी दरियादिली ही थी कि उन्होंने सस्ते कॉल रेट, अनलिमिटेड मुफ्त sms और नाईट कालिंग जैसी अनेको सुविधाएं देकर इस प्रेम-विचारधाराके अनुयायियों को प्रोत्साहित किया।
हालांकि, ऐसा नहीं है कि इस विषय पर 'राजनीति' ने कोई सहयोग नहीं किया, या हुकूमतें हाथ बांधे कड़ी रहीं और नेता खामोश रहे - नहीं ऐसा बिलकुल नहीं है, बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी इस क्रांति के समर्थन स्वर गूंजने लगे, सरकारों के सहयोग से प्रेमी जोड़ो के लिए 'प्रेम-स्थल' बनवाये गए जिन्हें बाद में बाद में 'पार्क' कहा जाने लगा। लगे हाथों सरकार ने अंतरजातिय जोड़ो को सुरक्षा प्रदान करने का एलान भी कर दिया और तो और सरकारी सीनों की असल नर्म दिली का अंदाज़ा तब लगा जब जोड़ों को बिना विवाह रहने की संवैधानिक अनुमति दे दी गयी। ये एक युग परिवर्तन था, प्रेम-क्रांति के बाग़ी फूलो के खिलने का आगाज़ था जिसने लोगो को अपनी पत्नी में अपनी प्रेमिका ढूंढना सिखाया। इस सामाजिक बदलाव ने पति-पत्नी के रिश्तो को और सुन्दर बनाकर इस रिश्ते के दायरे को महज़, पति के खाना खाने पर पत्नी के पंखा झलने से आगे निकाला। इश्क ने पंख फैलाए और बिना किसी फिक्र के मोहब्बत के आसमान में उड़ान भरने की तैयारी कर ली। वर्तमान समाज ऐसे उदाहरणों से पटा पड़ा है जो इस बात की पुष्टि करते हैं। यकीन न हो तो बिहार के माधेपुर चलिए, यहाँ पर लक्ष्मी देवी नाम का एक मंदिर है, जहाँ हर साल Valentines डे, बल्कि उससे पहले ही बहुत से प्रेमी जोड़े आकर अपने प्यार की कामयाबी की दुआ करते हैं। अब यह भी जान लीजिये की यह मंडित किसने बनवाया। मंदिर बनवाने वाले व्यक्ति का नाम रामेश्वर प्रसाद यादव है, यह स्वयं भी पिछले कई सालो से लक्ष्मी देवी की मूर्ति पर रोज़ाना श्रद्धापूर्वक फूल माला चढ़ाते हैं, लेकिन जान के हैरानी होगी की यह लक्ष्मी देवी कोई और नहीं इन महाशय की पत्नी हैं, जिनका स्वर्गवास कुछ साल पहले हो गया था। जिसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी का एक मंदिर बनवाकर उनकी प्रतिमा भी स्थापित करवाई, जहाँ वो प्रतिदिन नियमपूर्वक पूजा भी करते हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने पत्नी की मूर्ती के साथ अपनी मूर्ती भी लगा रखी है।अब इसे क्या कहेंगे? वैवाहिक बंधन या फिर प्रेम की पराकाष्ठा। इस बारे में कोई दूसरी राय ढूँढने से भी नहीं मिलेगी की यह पति-पत्नी के रिश्ते के आगे बढ़कर एक दुसरे में प्रेमी-प्रेमिका को ढूंढ लाने की एक सच्ची और सफल कोशिश है। प्रेम जब हद्द से गुज़रता है तो समाज नए उदाहरण गढ़ता है, नए नायक ढूंढता है और नयी बात कहता है, जैसा कि रामेश्वर प्रसाद यादव ने कही।
सवाल यह उठता है कि प्रेम में ऐसा कौन सा आकर्षण पैदा किया गया था, जिसकी वजह से समाज के समाज इससे जुड़ते चले गए। एक बहुत बड़े वर्ग का यह भी मानना है कि प्रेम में कला का मिश्रण, प्रेम-वैज्ञानिकों का एक ऐसा फ़ॉर्मूला था जिसने अपना काम तयशुदा समय से पहले ही कर दिखाया। प्रेम और कला का संगम एक मील का पत्थर साबित हुआ। यह अनूठा संगम इतना सुन्दर और आकर्षक था की पुश्तें की पुश्तें इसकी चपेट में आ गयीं। शायरी- गीत- नज़्म-ग़ज़ल साहित्य की हर विधा में इस विषय पर इतना कलम चला की लोग किसी अचार विज्ञापन की बेसलाइन 'चखे बिना रहा ना जाए' को अपनी ज़िन्दगी की सच्चाई सा महसूस करने लगे। मीर ग़ालिब और दाग़ को फिर से खंगाला गया और साहिर-कैफ़ी और मजाज़ जैसे शायरों ने इस सामाजिक क्रांति की आग के लिए इतना ईंधन तैयार कर दिया की लपटें अब तक मद्धम नहीं पड़ी हैं ।
लेकिन ज़रा देख लीजिये - कैसा दुर्भाग्य है की युगों-युगों तक चली इस जंग का ज़िक्र इतिहास की किसी किताब में नहीं है और न ही किसी स्कूली किताब में इस क्रांति के नायको की जीवनी है। मगर शायद ऐसा इसलिए है क्योंकि इस साहित्य का मर्म लाइ्ब्रेरीज़ और स्कूलों से निकल कर समझने लायक है और इस 'नागरिक अधिकार' का प्रयोग खुली हवाओं में किया जाने लायक है, वो कहते हैं ना Love is in the air.
आइये, इस Valentine's दिवस पर प्रणाम करें ज़मानों-पार के उन बिना स्मारक, बिना प्रेरणा स्थल वाले शहीदों को जिन्होंने 'प्रेम' को हम तक पहुँचाया और हमें जीवन में हँसने-रोनें की एक और माक़ूल वजह दी।
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