Monday, 23 April 2012

दो ख़त


मैं ये भी जानता हूं, तुम कहोगी कि रिश्ते का वजूद हर बार किसी एक हाँ--ना पर नही ठहर सकता और ये भी कि तुम्हे ऐतराज़ होगा हर उस बात से जो मैं आज कहूँ....क्योंकि मैं तुम्हारा गुनहगार हूं आफ़िया... फिर भी मैं कहूँगा कि एक बार, सिर्फ एक बार.... भुला दो वो सब कुछ जो हुआ...भुला दो उन तल्खियों को, उन स्याह लम्हों को, मेरी उन ना समझियों को.....और झांको, वक्त की खिड़की से,  जो उस दुनिया में खुलती है जहाँ हम साथ हों। कोई ऐसी जगह, जो गुनाह ओ सवाब से आज़ाद हो, जहाँ स्याह-सफेद एक हो सकें, जिसका कोई खुदा ना हो। आफ़िया, तुम्हारे इश्क़ की जन्नत से निकल कर जब दुनिया को परखा तो पाया मेरी ये मेरी जैसी ही है। वैसी नही जैसी मुझे उम्मीद थी। ये फ़रेबी है, स्याह है, बदक़ार है। मै़ इस दुनिया को लांघ कर तुम्हारी उस जन्नत में दोबारा आना चाहता हूँ, जिसे मैं ठुकरा आया था। मेरा रास्ता मत रोकना आफि़या... रास्ता मत रोकना .. तुम्हें मेरी क़सम...
तुम्हारा ग़म-नाक़ कल,
   नसीर

नसीर, जब तुम गए, तुम्हे रोका नही, अब वापसी चाहते हो, अब भी नही रोकूंगी मगर दुशवारी ये, कि जहाँ अब तुम खड़े हो वहाँ से कोई रास्ता यहाँ तक नही आता। ज़रा ग़ौर से देखो। तुम उस आने वाले कल की बात करते हो, जो सच है या झूठ किसे पता। और मै उस गुज़रे हुए कल को सोचती हूँ, जो मुझ में ठहर गया है। हालाँकि, मुझे ख़्याल है कि आसुओं से धुल चुकी तुम्हारी मुहब्बत अब पाक़ हो चुकी है... इन्क़ार क़ुफ़्र है, मगर परवाह नही, मैं इस ख़्याल पर जीना चाहता हूँ कि कल तक जो मेरा गुनाहगार था, आज से मैं उसकी गुनाहगार हूँ, वैसे ही जैसे तुमने ठुकराया था। याद है, तुम कितना रोये थे ये कहते हुए "मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ आफि़या... मगर माफ़ कर देना.. मैं मजबूर हूँ.."। अच्छा या बुरा... आज तुम्हे वो सब कुछ लौटा रही हूँ, जो तुमसे मिला था, वैसे ही। बस इन सूख चुकी आँखों से रो नही सकती, इसलिए तुम्हारे आँसू मुझ पर उधार रहे...
तुम्हारा अफ़सोस-नाक़ आज
      आफि़या

" बाबा जमशेद क़मर सिद्दीक़ी की क़ब्र "

आज से क़रीब 200 साल बाद, किसी website पर जिसकी viewership 
लगभग ना के बराबर होगी। कोई टुटपुंजिया पत्रकार जो किसी नई स्टोरी की तलाश में होगा, बेवजह ये article छापेगा। जिसे कोई नही देखेगा.......



                        जामिया यूनिवर्सिटी के पीछे, बनी एक पुरानी मज़ार
जामिया यूनिवर्सिटी के पीछे, बनी एक पुरानी मज़ार जो हम्दिया मज़ार के नाम से भी मशहूर है, सरकारी उदासीनता की शिकार है। उजड़ी और टूटी फूटी ये मज़ार, दिन रात हैरान सी आसमान को ताका करती है। ये मजा़र किसकी है या इसका इतिहास क्या है इस बारे मे तो कोई भी बहुत तफ्सील से नही जानता, मगर अक्सर यहाँ नौजावानों को फुल चढ़ाते और अगरबत्ती सुलगाते देखा जाता है। जो पूछने पर बताते हैं कि यह मज़ार बाबा जमशेद रहमतुल्लाह एलैह. की है। हालाकिं उनको इसके आगे कुछ नही मालूम । इसकी उम्र की वजह से पुरातत्व विभाग ने कई बार इसकी मरम्मत करावाई। कहने वाले कहते हैं कि इसके ठीक सामने लगे इमली के पेड़ की उस डाल की पत्ती खाने से, जिसकी परछाईं मजार के ऊपरी मेहराब पर पड़ती है, आप को सच्ची मुहब्बत मिलती है। शायद यही वजह है कि दिन भर यहां नौजवान लड़के लड़कियो का ताँता लगा रहता है।
दिल्ली यूनिवर्सिटी के अन्ना हज़ारे पुस्तकालय में इनकी तीन पुस्तकें मौजूद हैं 'आवाज़ की दरारें' , 'खामोश शाम' और 'चराग़ और मैं' । जिसमें से "खामोश शाम" अधूरी है । मशहूर इतिहासकार अहमद क़िदवई "खामोश शाम" को ही इनकी आखिरी किताब मानते हैं । वो मानते हैं कि 'चराग़ और मैं' से प्राप्त थोड़ी बहुत जानकारी के आधार पर ही यह अनुमान लगाया जा सका है कि इनका इतिहास करीब 200 साल या थोड़ा उससे पहले का है। वो मानते हैं कि इनकी पैदाईश 'मुलायम नगर' (तब "लखनऊ") की है और अपने उम्र के करीब 20वें साल (या 25 वें, इस पर अलग अलग मत हैं) में दिल्ली आये थे। शाईरी से खास लगाव था और आम बहुत पसंद थे । हालाकिं, इस बात के कोई पुख्ता प्रमाण तो नही हैं मगर कई लोग यह भी कहते हैं की मुहब्बत मे मिले धोखे को बर्दाश्त ना कर पाने की वजह से इनकी मौत हूई । माना जाता है की बेबाक और फराग़दिल होने की वजह से 21 वीं सदी की शुरूवात मे ही इनके कई मुरीद बन गए थे, जिनकी तादाद उम्र के आखिरी पड़ाव तक आते-आते काफी बढ़ गई थी। जिनमे से कुछ मुरीदों के वंशज आज भी मौजूद हैं और हर साल नवंबर की 22 तारीख को 'हम्दिया उर्स" मनाते हैं और तब यहाँ मेले का आयोजन होता है. इस उर्स का नाम हम्दिया उर्स कैसे पड़ा ये तो किसी को ठीक तरह से नही मालूम, मगर जब हमने एक मुरीद ज़ुबैर अली (जो हर साल उर्स में सपरिवार के शामिल होते हैं) से इस बारे में बात करना चाहा, तो उनका जवाब कुछ यूं था, " ज़्यादा तो नही मालूम, लेकिन...शायद बाबा जमशेद रहमतुल्लाह एलैह का तख़ल्लुस 'हम्द' था .. इसीलिये.. हम..इसको हम्दिया उर्स कहते हैं, हम इनके करिश़मों के बारे मे कई पीढ़ियो से सुनते आ रहे हैं, हमारे दादा-परदादा सभी इस उर्स को मनाते थे, हम उस रिवाज़ को आज तक ज़िन्दा रखे हैं और ईंशाअल्लाह हमारी आने वाली पीढ़ियां इसे क़ायम रखेंगी"। एक और मुरीद शामिया सुलेमान (जो पेशे से वकील है) ने कहा की यहाँ आकर उन्हे एक अजीब सा सुकून मिलता है, उन्होने कहा " मै बचपन मे अपनी नानी से इनके बारे मे बहुत सुनती थी, एक कहानी वो अक्सर सुनाती थीं, जिस में बाबा ने अपने झोले में कलम रख कर जंगल कि तरफ चल देतें हैं और कुछ दूर पर जब वो कुछ लुटेरों को किसी शक्स को लूटते हुए देखतें हैं तो वह उसी झोले में हाथ डालते हैं और तलवार निकाल कर उन लुटेरों का सरकलम कर देते हैं। ऐसे कई किस्से मैं बचपन से सुनती आई हूँ, शायद इसी का मुझ पर बहुत गहरा असर हुआ है।" शामिया आगे कहती हैं की उन्होने दिल्ली न्यायालय में हम्दिया मज़ार के रख-रखाव पर ध्यान देने के लिये एक जन हित याचिका भी दायर की है, जिसकी सुनवाई जल्द हो सकती है।

बहरहाल, अभी सूरते हाल ये है की मज़ार बाईं ओर से झुक गई है और काफ़ी जीर्ण-शीर्ण अवस्था मे है, सभी मेहराबें टूट चुकीं हैं और मज़ार आस पास सूखी हई पत्तियों से घिरी रहती है । अभी कुछ दिन पहले ही ज़ायरीन की जलाई अगरबत्ती के शायद सूखी पत्तियों पर गिर जाने से बुरी तरह आग लग गई थी, जिसमें मज़ार का एक हिस्सा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था। बताते चलें की रेहान वडेरा (पुत्र : प्रियंका गांधी) के प्रपौत्र रोहान गाँधी, दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने से पहले यहाँ आए थे और आश्वासन दिया था कि जल्द ही हम्दिया मज़ार कि देख-रेख के लिये एक समिति गठित करेंगे, ज़ाहिर है, ऐसा हुआ नही !
चलते- चलते उनका ही एक शेर, हमारी तरफ से उन्हें श्रद्दांजलि के तौर पर -
“मौत तो आनी ही थी, यह हाय-हाय कयों
क्यों ग़म करें जब बात बस अफसोस भर की है”