मैं ये भी जानता हूं, तुम कहोगी कि रिश्ते का वजूद हर बार किसी एक हाँ--ना पर नही ठहर सकता और ये भी कि तुम्हे ऐतराज़ होगा हर उस बात से जो मैं आज कहूँ....क्योंकि मैं तुम्हारा गुनहगार हूं आफ़िया... फिर भी मैं कहूँगा कि एक बार, सिर्फ एक बार.... भुला दो वो सब कुछ जो हुआ...भुला दो उन तल्खियों को, उन स्याह लम्हों को, मेरी उन ना समझियों को.....और झांको, वक्त की खिड़की से, जो उस दुनिया में खुलती है जहाँ हम साथ हों। कोई ऐसी जगह, जो गुनाह ओ सवाब से आज़ाद हो, जहाँ स्याह-सफेद एक हो सकें, जिसका कोई खुदा ना हो। आफ़िया, तुम्हारे इश्क़ की जन्नत से निकल कर जब दुनिया को परखा तो पाया मेरी ये मेरी जैसी ही है। वैसी नही जैसी मुझे उम्मीद थी। ये फ़रेबी है, स्याह है, बदक़ार है। मै़ इस दुनिया को लांघ कर तुम्हारी उस जन्नत में दोबारा आना चाहता हूँ, जिसे मैं ठुकरा आया था। मेरा रास्ता मत रोकना आफि़या... रास्ता मत रोकना .. तुम्हें मेरी क़सम...
तुम्हारा ग़म-नाक़ कल,
नसीर
नसीर, जब तुम गए, तुम्हे रोका नही, अब वापसी चाहते हो, अब भी नही रोकूंगी मगर दुशवारी ये, कि जहाँ अब तुम खड़े हो वहाँ से कोई रास्ता यहाँ तक नही आता। ज़रा ग़ौर से देखो। तुम उस आने वाले कल की बात करते हो, जो सच है या झूठ किसे पता। और मै उस गुज़रे हुए कल को सोचती हूँ, जो मुझ में ठहर गया है। हालाँकि, मुझे ख़्याल है कि आसुओं से धुल चुकी तुम्हारी मुहब्बत अब पाक़ हो चुकी है... इन्क़ार क़ुफ़्र है, मगर परवाह नही, मैं इस ख़्याल पर जीना चाहता हूँ कि कल तक जो मेरा गुनाहगार था, आज से मैं उसकी गुनाहगार हूँ, वैसे ही जैसे तुमने ठुकराया था। याद है, तुम कितना रोये थे ये कहते हुए "मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ आफि़या... मगर माफ़ कर देना.. मैं मजबूर हूँ.."। अच्छा या बुरा... आज तुम्हे वो सब कुछ लौटा रही हूँ, जो तुमसे मिला था, वैसे ही। बस इन सूख चुकी आँखों से रो नही सकती, इसलिए तुम्हारे आँसू मुझ पर उधार रहे...
तुम्हारा अफ़सोस-नाक़ आज
आफि़या

No comments:
Post a Comment