प्रेम पत्र लिखना ख़बर लिखने से ज़्यादा मुश्किल होता है । तुम कहोगे, मुश्किल तो सड़क पार करना भी होता है, लेकिन यक़ीन करो 'सात मरे-आठ घायल' की ज़बान में प्यार की गुंजाईश नही रहती । सुनो, तुम बेवकूफ ही रहे जो हमेशा 'आख़िरी तक' साथ खड़े रहने का वायदा ही मांगते रहे, दुनिया तो क़ाफी आगे बढ़ गई है, और यहां तो सवाल 'सबसे पहले' का ही होता है, ख़ैर...। मगर तुम्हारी क़सम, नज़रों के सामने बदलती तेज़ रफ़्तार तस्वीरों में हर बार तुम्हारा उदास चेहरा ढूंढ ही लेता हूँ । जानता हूँ, वक्त जो तुम्हारा है, ये ख़बरें फांक जाती हैं और हाथ क्या आता है, थोड़ी सी खनक, बस और क्या । कभी-कभी सोचता हूँ ये सियासत की खबरें नहीं, खबरों की सियासत है ।

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