DTC की सख्त सीटो में न जाने कितनी, नर्म और छोटी-छोटी प्रेम कहानिया ने जन्म लिया होगा। जो बिना संवाद के शुरू और ख़त्म हो गयी होंगी। जिनकी नज़रों ने भीड़ में एकांत को जन्म दिया होगा। और न जाने कितने लोग, किसी एक स्टॉप पर हमेशा के लिए बिछर गए होंगे, बिना रोये, बिना आखिरी सलाम और अलविदा कहे बगैर भी। कोई भी कथाकार इन कहानियों को नाम नहीं दे सकता। प्रेम-विज्ञान की किताबो में कहीं भी इनका ज़िक्र नहीं है। शायद किसी में हिम्मत नहीं थी। याद रखिये, इश्क और छिछोरेपन के बीच एक बहुत बारीक रेखा होती है। और इसी वजह से न जाने कितने टिकट, जिन पर कुछ लिखा होगा, किसी बस-स्टॉप पर मोड़ कर फ़ेंक दिए गए होंगे। ‘फिर मिलेंगे’ की उम्मीद से...

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