Wednesday, 16 May 2012

क्या लिखूँ

आधी रात, पूरी ख़ामोशी और मैं अघूरा सा
सोचतें हैं कुछ लिखें मगर क्या
एक मशगूल कमरा जो अभी-अभी फ़ारिग हुआ
आहटों, हलचलों और ठहाकों से
एक दम तोड़ती अघजली सिगरेट
और एक ऊदास काग़ज़ पर ठहरा सा क़लम
सब बेलफ़्ज़, सब बेख़्याल ।
क्या लिखूँ?
कोई बात जो तुमको बेहद पसंद हो
या तुम्हारी ज़ुल्फ की गिरहों में उलझी कोई नज़्म
या फिर कोई गीत तुम्हारे ज़िक्र का
या लिखूँ कोई सवाल जिसका जवाब तुम्हारी हाथ की लकीरों मे ना हो ।
क्या लिखूँ
या फिर यूँ करूँ
खुद पर लिखूँ कोई ऐसी बात
जो इतनी पुरानी हो कि नई लगे
लड़कपन की आवारा शामों पर लिखूँ
या बचपन के उन कच्चे रंग वाले मिट्टी खिलौनों पर
जिनका रंग हाथेलियों पर रह जाता था ।
क्या लिखूँ
कुछ तो हो कि क़लम चले
लिखूँ इस शहर की चिकनी सड़कों पर
या उन सड़कों पर रेंगते अधनंगे बच्चों पर
लिखूँ चैन से सोती इस ख़ामोश गली पर
या उस मकान से आती एक रोती-चीख़ पर
क्या लिखूँ

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