आवाज़ के कारखाने, जो रात भर सजे रहते हैं,
उसी बेरूह शहर की निशानी है जो बेवजह जिंदा है.
मोहल्ले की किसी स्याह रात में,
सन्नाटे को चुनौती देती एक दरवाज़े पर दबी सी दस्तक
हाँ शायद, कोई बेटी लौटी है नींद बेच कर
सुबह के सूरज से अरसा हुआ मुलाक़ात हुए,
नहीं मालूम दीवारों से कैसे धूप उतरती है
वक़्त की कतरन पर ज़िन्दगी को सजाना आसान नहीं
जीने की मोहलत और मरने की फुर्सत से दूर,
इश्क से बातों का वक़्त बेसब्र गाड़ियों में ढूंढते कुछ लोग
इश्क उदास है और मोहब्बत मसरूफ
यह जानते हैं कानो को ढक कर
दुनिया से गाफिल होने का फन.
चमचमाती दुनिया में उदासी की सिसकी कौन सुने,
उजालो की रौनक में अंधेरो का हाल कौन पूछे
मोहब्बत इनकी जेबों में जिंदा है
मगर मैं जानता हूँ तुम्हारे होंठ कुछ भी कहें,
तुम्हारी आँखों की तरह यह शहर भी उदास है

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