Monday, 21 May 2012

“गौरव सोलंकी की पीठ ठोकिये, क्योंकी डकैत सिर्फ पार्लयामेंट में नही होते”



मजबूरी और महत्वाकांक्षा ज़्यादातर लेखको की जुबां पर अपने शब्द रख देती है। क़लम घिसने वालो के लिए ये बेहद ज़रूरी है कि वो अपने अन्दर का लेखक कभी मरने न दें। विशेषरूप से, जब बाज़ारवाद में डूबी संस्थाए लेखकों को पुरस्कार उनके सम्मान को बढ़ाने के लिए नही, उनके सम्मान को खरीदने के लिए या अहसान तले दबाने के लिए देती हैं। मुझे आज तक समझ नहीं आया कि कैसे कोई संगठन या संस्था इतनी ताक़तवर हो सकती है कि किसी रचना का समाज तक पहुंचना या न पहुंचना, संस्था के विवेक पर निर्भर करे। क्या ये उस समाज की अपनी सोच को कमतरी से आंकना नहीं हुआ? या क्या ये खुद के बारे में 'अहम् ब्रह्मास्मि' जैसी कोई राय बनाने वाली बात नहीं है?

हर रचना को श्लील या अश्लील के चश्मे से आंकने वाले ये क्यों भूल जाते हैं कि हम एक ऐसे युग के सफ़र में हैं जिसके वक़्त का एक पहिया वक़्त से बहुत आगे चल रहा है, ये वो समाज है जिसके लिए धर्म, सेक्स या कुछ भी टैबू नहीं है। कम से कम सेक्स तो बिलकुल नहीं, बल्कि वो तो मुद्दा ही नहीं है। सेक्स कंटेंट के लिए किताबें झांकना इस युग कि बात नहीं है। इस दौर में की-बोर्ड का एक इंटर उस कंटेंट का अम्बार लगाने में सक्षम है। यहाँ, कोई व्यक्ति किताबो की तरफ तब आता है जब उसका लगाव साहित्य या लेखन से हो और इसलिए वो अपनी सोच, समझ और व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी पर ही पन्ने उलटना चाहता है। लेकिन अगर मान भी लिया जाए की सरकार या किसी संस्था की फिक्र असली है तो उस इन्टरनेट कंटेंट के लिए उनके माथे पर कोई शिकन क्यों नहीं आती? उस आईने में खुद को इतना निरीह क्यों देखा जाता है, क्या यह दिखावा नहीं है, ढकोसला नहीं है?

गौरव सोलंकी के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ है, ज़बर्दुस्त पटकथा, बेहतरीन पात्रों और उम्दा संवाद वाले शानदार लेखन की प्रतिभा से लबालब उसकी एक रचना पर अचानक अश्लील का ठप्पा जड़ दिया जाता है, जबकि उसी संस्था की पत्रिका में पहले उस रचना को सादर स्वीकार कर सम्मानित किया जाता है, पलकों पर बिठाया जाता है। इसमें कोई 2 राय नहीं की घटना में व्यक्तिगत स्वार्थ या हित के कारण ऐसा निर्णय लिया गया है। जिसकी निंदा आवश्यक है क्योंकी ये वही ताकतें हैं जो नए लेखकों को भी उठने नही देना चाहती और नई प्रतिभाओं की किसी बेहतरीन रचना से उनका हाज़मा बिगड़ जाता है।

नए लेखको की कूड़ा रचनाओं में कुछ हो न हो नयापन ज़रूर होता है, और यकीन करना पड़ेगा की उन्हीं कूड़ा रचनाओ में कुछ ऐसी रचनाएँ होती हैं, जो वक़्त के साथ अपने आप सोना हो जाती हैं, बिना एक भी शब्द बदले। लेकिन यहाँ तो संपन्न लेखको ने नए लेखको के लिए 'प्रवेश वर्जित' टाइप बोर्ड लगा रखा है, और उनकी नज़र में यह साहित्यिक गुसपैठ है। मगर, जिस तरह बढ़ी दाढ़ी, ढीला कुर्ता, लम्बे बाल और कंधे पर झोला लटका लेने से कोई लेखक नहीं बन जाता उसी तरह ऐसा नियम भी नहीं हो सकता की कोई नया लेखक उन तमाम खुदगर्ज़ लेखकों से बेहतर ना कह सके। वो कह सकता है, और कहता है मगर अनसुना कर दिया जाता है। और उसकी रचनाओं को कभी कमज़ोर, कभी असाहित्यिक और कभी अश्लील करार देकर पीछे धकेल दिया जाता है, व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए। मगर ज्ञानपीठ ने कभी सोचा भी नहीं होगा की 25-26 साल का कोई नवोदित लेखक उनका दिया हुआ पुरस्कार उन्हीं की मूँह पर मार देगा। ऐसे परिवेश में पान सिंह तोमर का वो संवाद "डकैत होते हैं पार्लयामेंट में" अपनी प्रासंगिकता खो देता है क्योंकि घटनाक्रम बताता है की डकैत सिर्फ पार्लयामेंट में नहीं होते।

यहाँ इस बात का ज़िक्र बहुत ज़रूरी है की गौरव सोलंकी ने जो किया है, उसके लिए बहुत बड़ा जिगर चाहिए, इसलिए प्रतिभावान लेखक और आत्म सम्मान को बचाने के लिए उसकी लड़ाई दोनों की दिल खोल कर सराहना की जानी चाहिए।
 ज्ञानपीठ जैसे संस्थानों में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ बज चुके इस बिगुल से हमें पूरी आशा होनी चाहिए। यह एक मौका है जब साहित्यिक भ्रष्टाचार के वजूद को बेहद ताक़तवर तरीके से उजागर किया जा सकता है। सभी लेखको को इस वक़्त एक साथ होना चाहिए। इस लड़ाई में एक दुसरे का हाथ थाम कर साहित्य के उन बाज़ारू तख़्त ओ ताज को गिराने के लिए आगे बढ़ना चाहिए, मगर व्यथा ये की बहुत से लेखक अब भी ख़ामोश हैं। वजह यह कि उनकी कोई पुस्तक या तो छपने वाली है या उसे छापने का वादा किया गया है या फिर उन्होंने स्कूल में पढ़ी वो 'पानी में रहकर मगर से बैर' वाली कहावत ज़्यादा गंभीरती से याद कर ली थी। लानत है ऐसी किताबों और लेखों पर जो साहित्यिक और व्यक्तिगत मूल्यों कि कीमत पर लिखे गए हो। सब को समझना होगा कि ये वक़्त बेहद नाज़ुक है, क़लम पर लटकती तलवार की तेज़ धार शब्दों को अपने मायनों में तराश न दे, इसलिए सबको साथ आना होगा। साथ आएँ और इस प्रयत्न में भागीदार बनें, जो समाज में लेखको को इज्ज़त से जीने की हक़ दे सके। आगे आइये, एक ऐसे परिवेश के निर्माण के लिए जहाँ अच्छे-बुरे, हलके-वज़नी, श्लील-अश्लील की कसौटी असली हो, सच्ची हो - किसी राजनीतिक या भाई भतीजावाद से प्रेरित नहीं। सोलंकी जैसे लेखको को हज़ार सलाम। साथ आइये।






Wednesday, 16 May 2012

क्या लिखूँ

आधी रात, पूरी ख़ामोशी और मैं अघूरा सा
सोचतें हैं कुछ लिखें मगर क्या
एक मशगूल कमरा जो अभी-अभी फ़ारिग हुआ
आहटों, हलचलों और ठहाकों से
एक दम तोड़ती अघजली सिगरेट
और एक ऊदास काग़ज़ पर ठहरा सा क़लम
सब बेलफ़्ज़, सब बेख़्याल ।
क्या लिखूँ?
कोई बात जो तुमको बेहद पसंद हो
या तुम्हारी ज़ुल्फ की गिरहों में उलझी कोई नज़्म
या फिर कोई गीत तुम्हारे ज़िक्र का
या लिखूँ कोई सवाल जिसका जवाब तुम्हारी हाथ की लकीरों मे ना हो ।
क्या लिखूँ
या फिर यूँ करूँ
खुद पर लिखूँ कोई ऐसी बात
जो इतनी पुरानी हो कि नई लगे
लड़कपन की आवारा शामों पर लिखूँ
या बचपन के उन कच्चे रंग वाले मिट्टी खिलौनों पर
जिनका रंग हाथेलियों पर रह जाता था ।
क्या लिखूँ
कुछ तो हो कि क़लम चले
लिखूँ इस शहर की चिकनी सड़कों पर
या उन सड़कों पर रेंगते अधनंगे बच्चों पर
लिखूँ चैन से सोती इस ख़ामोश गली पर
या उस मकान से आती एक रोती-चीख़ पर
क्या लिखूँ

Monday, 23 April 2012

दो ख़त


मैं ये भी जानता हूं, तुम कहोगी कि रिश्ते का वजूद हर बार किसी एक हाँ--ना पर नही ठहर सकता और ये भी कि तुम्हे ऐतराज़ होगा हर उस बात से जो मैं आज कहूँ....क्योंकि मैं तुम्हारा गुनहगार हूं आफ़िया... फिर भी मैं कहूँगा कि एक बार, सिर्फ एक बार.... भुला दो वो सब कुछ जो हुआ...भुला दो उन तल्खियों को, उन स्याह लम्हों को, मेरी उन ना समझियों को.....और झांको, वक्त की खिड़की से,  जो उस दुनिया में खुलती है जहाँ हम साथ हों। कोई ऐसी जगह, जो गुनाह ओ सवाब से आज़ाद हो, जहाँ स्याह-सफेद एक हो सकें, जिसका कोई खुदा ना हो। आफ़िया, तुम्हारे इश्क़ की जन्नत से निकल कर जब दुनिया को परखा तो पाया मेरी ये मेरी जैसी ही है। वैसी नही जैसी मुझे उम्मीद थी। ये फ़रेबी है, स्याह है, बदक़ार है। मै़ इस दुनिया को लांघ कर तुम्हारी उस जन्नत में दोबारा आना चाहता हूँ, जिसे मैं ठुकरा आया था। मेरा रास्ता मत रोकना आफि़या... रास्ता मत रोकना .. तुम्हें मेरी क़सम...
तुम्हारा ग़म-नाक़ कल,
   नसीर

नसीर, जब तुम गए, तुम्हे रोका नही, अब वापसी चाहते हो, अब भी नही रोकूंगी मगर दुशवारी ये, कि जहाँ अब तुम खड़े हो वहाँ से कोई रास्ता यहाँ तक नही आता। ज़रा ग़ौर से देखो। तुम उस आने वाले कल की बात करते हो, जो सच है या झूठ किसे पता। और मै उस गुज़रे हुए कल को सोचती हूँ, जो मुझ में ठहर गया है। हालाँकि, मुझे ख़्याल है कि आसुओं से धुल चुकी तुम्हारी मुहब्बत अब पाक़ हो चुकी है... इन्क़ार क़ुफ़्र है, मगर परवाह नही, मैं इस ख़्याल पर जीना चाहता हूँ कि कल तक जो मेरा गुनाहगार था, आज से मैं उसकी गुनाहगार हूँ, वैसे ही जैसे तुमने ठुकराया था। याद है, तुम कितना रोये थे ये कहते हुए "मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ आफि़या... मगर माफ़ कर देना.. मैं मजबूर हूँ.."। अच्छा या बुरा... आज तुम्हे वो सब कुछ लौटा रही हूँ, जो तुमसे मिला था, वैसे ही। बस इन सूख चुकी आँखों से रो नही सकती, इसलिए तुम्हारे आँसू मुझ पर उधार रहे...
तुम्हारा अफ़सोस-नाक़ आज
      आफि़या

" बाबा जमशेद क़मर सिद्दीक़ी की क़ब्र "

आज से क़रीब 200 साल बाद, किसी website पर जिसकी viewership 
लगभग ना के बराबर होगी। कोई टुटपुंजिया पत्रकार जो किसी नई स्टोरी की तलाश में होगा, बेवजह ये article छापेगा। जिसे कोई नही देखेगा.......



                        जामिया यूनिवर्सिटी के पीछे, बनी एक पुरानी मज़ार
जामिया यूनिवर्सिटी के पीछे, बनी एक पुरानी मज़ार जो हम्दिया मज़ार के नाम से भी मशहूर है, सरकारी उदासीनता की शिकार है। उजड़ी और टूटी फूटी ये मज़ार, दिन रात हैरान सी आसमान को ताका करती है। ये मजा़र किसकी है या इसका इतिहास क्या है इस बारे मे तो कोई भी बहुत तफ्सील से नही जानता, मगर अक्सर यहाँ नौजावानों को फुल चढ़ाते और अगरबत्ती सुलगाते देखा जाता है। जो पूछने पर बताते हैं कि यह मज़ार बाबा जमशेद रहमतुल्लाह एलैह. की है। हालाकिं उनको इसके आगे कुछ नही मालूम । इसकी उम्र की वजह से पुरातत्व विभाग ने कई बार इसकी मरम्मत करावाई। कहने वाले कहते हैं कि इसके ठीक सामने लगे इमली के पेड़ की उस डाल की पत्ती खाने से, जिसकी परछाईं मजार के ऊपरी मेहराब पर पड़ती है, आप को सच्ची मुहब्बत मिलती है। शायद यही वजह है कि दिन भर यहां नौजवान लड़के लड़कियो का ताँता लगा रहता है।
दिल्ली यूनिवर्सिटी के अन्ना हज़ारे पुस्तकालय में इनकी तीन पुस्तकें मौजूद हैं 'आवाज़ की दरारें' , 'खामोश शाम' और 'चराग़ और मैं' । जिसमें से "खामोश शाम" अधूरी है । मशहूर इतिहासकार अहमद क़िदवई "खामोश शाम" को ही इनकी आखिरी किताब मानते हैं । वो मानते हैं कि 'चराग़ और मैं' से प्राप्त थोड़ी बहुत जानकारी के आधार पर ही यह अनुमान लगाया जा सका है कि इनका इतिहास करीब 200 साल या थोड़ा उससे पहले का है। वो मानते हैं कि इनकी पैदाईश 'मुलायम नगर' (तब "लखनऊ") की है और अपने उम्र के करीब 20वें साल (या 25 वें, इस पर अलग अलग मत हैं) में दिल्ली आये थे। शाईरी से खास लगाव था और आम बहुत पसंद थे । हालाकिं, इस बात के कोई पुख्ता प्रमाण तो नही हैं मगर कई लोग यह भी कहते हैं की मुहब्बत मे मिले धोखे को बर्दाश्त ना कर पाने की वजह से इनकी मौत हूई । माना जाता है की बेबाक और फराग़दिल होने की वजह से 21 वीं सदी की शुरूवात मे ही इनके कई मुरीद बन गए थे, जिनकी तादाद उम्र के आखिरी पड़ाव तक आते-आते काफी बढ़ गई थी। जिनमे से कुछ मुरीदों के वंशज आज भी मौजूद हैं और हर साल नवंबर की 22 तारीख को 'हम्दिया उर्स" मनाते हैं और तब यहाँ मेले का आयोजन होता है. इस उर्स का नाम हम्दिया उर्स कैसे पड़ा ये तो किसी को ठीक तरह से नही मालूम, मगर जब हमने एक मुरीद ज़ुबैर अली (जो हर साल उर्स में सपरिवार के शामिल होते हैं) से इस बारे में बात करना चाहा, तो उनका जवाब कुछ यूं था, " ज़्यादा तो नही मालूम, लेकिन...शायद बाबा जमशेद रहमतुल्लाह एलैह का तख़ल्लुस 'हम्द' था .. इसीलिये.. हम..इसको हम्दिया उर्स कहते हैं, हम इनके करिश़मों के बारे मे कई पीढ़ियो से सुनते आ रहे हैं, हमारे दादा-परदादा सभी इस उर्स को मनाते थे, हम उस रिवाज़ को आज तक ज़िन्दा रखे हैं और ईंशाअल्लाह हमारी आने वाली पीढ़ियां इसे क़ायम रखेंगी"। एक और मुरीद शामिया सुलेमान (जो पेशे से वकील है) ने कहा की यहाँ आकर उन्हे एक अजीब सा सुकून मिलता है, उन्होने कहा " मै बचपन मे अपनी नानी से इनके बारे मे बहुत सुनती थी, एक कहानी वो अक्सर सुनाती थीं, जिस में बाबा ने अपने झोले में कलम रख कर जंगल कि तरफ चल देतें हैं और कुछ दूर पर जब वो कुछ लुटेरों को किसी शक्स को लूटते हुए देखतें हैं तो वह उसी झोले में हाथ डालते हैं और तलवार निकाल कर उन लुटेरों का सरकलम कर देते हैं। ऐसे कई किस्से मैं बचपन से सुनती आई हूँ, शायद इसी का मुझ पर बहुत गहरा असर हुआ है।" शामिया आगे कहती हैं की उन्होने दिल्ली न्यायालय में हम्दिया मज़ार के रख-रखाव पर ध्यान देने के लिये एक जन हित याचिका भी दायर की है, जिसकी सुनवाई जल्द हो सकती है।

बहरहाल, अभी सूरते हाल ये है की मज़ार बाईं ओर से झुक गई है और काफ़ी जीर्ण-शीर्ण अवस्था मे है, सभी मेहराबें टूट चुकीं हैं और मज़ार आस पास सूखी हई पत्तियों से घिरी रहती है । अभी कुछ दिन पहले ही ज़ायरीन की जलाई अगरबत्ती के शायद सूखी पत्तियों पर गिर जाने से बुरी तरह आग लग गई थी, जिसमें मज़ार का एक हिस्सा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था। बताते चलें की रेहान वडेरा (पुत्र : प्रियंका गांधी) के प्रपौत्र रोहान गाँधी, दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने से पहले यहाँ आए थे और आश्वासन दिया था कि जल्द ही हम्दिया मज़ार कि देख-रेख के लिये एक समिति गठित करेंगे, ज़ाहिर है, ऐसा हुआ नही !
चलते- चलते उनका ही एक शेर, हमारी तरफ से उन्हें श्रद्दांजलि के तौर पर -
“मौत तो आनी ही थी, यह हाय-हाय कयों
क्यों ग़म करें जब बात बस अफसोस भर की है”

Sunday, 12 February 2012

'प्रेम का मौलिक अधिकार' - Valentine's Special




नए ज़माने ने जो अधिकार आम-आदमी को सुलभ कराए उनमे से एक 'प्रेम का मौलिक अधिकार' भी था। वर्ना एक वक़्त था जब इश्क-मोहब्बत राजा, रजवाड़ो और बादशाहों के शगूफ़े माने जाते थे, या यूँ कह लीजिये कि उस ज़माने में ये Page 3 Material था। आम आदमी ने तो तब तक प्यार करना सीखा ही नहीं था। वह तो ग़दर, हरित क्रांति, औघोगिक क्रांति में ही उलझा रहा। प्रेम क्रांति की तरफ उसका ध्यान जाने ही नहीं दिया गया ।
आज हालात बदल चुके हैं, इश्क़ महलों से निकल कर गलियों से होता हुआ घरों के छज्जे तक पहुँच गया है, और प्रेम के इस विस्तार की गति इतनी तीव्र थी कि - क्या कॉलेज - क्या कार्यालय सबको सामान अधिकार प्रदान किया, यानी Equal Opportunity for All. आज जब प्यार करने का मौलिक अधिकार सबकी जेब में खनखना रहा है तो इस प्रेम के सशक्तिकरण को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाने के लिए एक दिन भी सुनिश्चित कर लिया गया है। नाम दिया गया है - Valentine's Day.  अब यह St Valentine’s कौन थे, हमारे देश में हुई प्रेम क्रांति में इनका क्या योगदान था, इन सवालों में मत उलझिए, कहा ना - यह सिर्फ एक प्रतीक हैं। और अंग्रेजी नाम से यह मत समझियेगा की concept विदेश से चुराया गया है- बिलकुल भी नहीं साहब ! हाँ बस थोड़ी inspiration ली है।
खैर, नाम में क्या रखा है अगर Valentine's दिवस, संत Valentine के नाम पर न होकर 'संत बैजनाथ दिवस' होता तो क्या कोई फर्क पड़ता? तारीख चाहे बदल भी जाती मगर साउथ एक्स के अंसल प्लाज़ा में तब भी बैठने की जगह ना मिलती, लखनऊ के अमीनाबाद में पुलिस तब भी तैनात होती और मुंबई के जुहू-चौपाटी पर तब भी भुट्टे जोड़े में ही बिकते। बहरहाल, विषय पर वापस आते हैं हम बात कर रहे थे - 'प्रेम के सामाजिक संघर्ष की' । आज समाज में जहाँ नयी पीढ़ी में 'प्रेम के प्रति जागरूकता' कूट-कूट के भरी है और वातावरण काफी love-friendly है, तो इसका श्रेय उन तमाम प्रेम-क्रांतिकारियों को जाता है जिन्होंने इस संघर्ष की राह में अपनी जानें तक कुर्बान कर दीं। इस फेहरिस्त में सबसे ऊपर नाम आता है लैला-क़ैस का (क़ैस, जिन्होंने बाद में मजनूं के नाम से ख्याति प्राप्त की)। ये वही युगल थे जो बाद में इस क्रांति के अग्रदूत बने। कहते हैं, आदमी मर जाता है उसके विचार नहीं - यही वजह है की लैला-मजनूं की कुर्बानी के बाद उनके विचारों का बीज समाज में पनपता रहा जिसे बाद में हमने पर्दे पर देखा। आज के सामाजिक परिवेश में सभी के लिए 'प्रेम के सामान अवसर' मौजूद हैं और यह इसलिए सामान हैं क्योंकि सभी को सामान रूप से 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' प्रदान की गयी है। आज कोई भी इस विचारधारा वाला व्यक्ति अपने प्यार का इज़हार कर सकता है, वो स्वतंत्र है अपने विचारों को सामने वाले/वाली को अभिव्यक्त करने के लिए।
वर्तमान सामाज में ‘प्रेम-विचारधारा’ को पनपने के अनुकूल साधन भी सुलभ कराए गए हैं । आज कबूतरों के गले में चिट्ठियाँ बाँध कर भेजने का रिस्क लेने की आवश्यकता नहीं रही। अरे भई! जानवर आखिर जानवर है। मेरा ख़याल है कबूतरों के ग़लत हाथों में चिट्ठियाँ पहुंचा देने पर, कभी इसके बहुत भयंकार परिणाम हुए होंगे, जिसके कारण इस प्रथा पर रोक लगा दी गयी होगी। लेकिन इश्किया-इन्किलाब की आग की तपिश ने 'आवश्यकता आविष्कार की जननी है' वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए - एक सस्ता और सुरक्षित विकल्प ढूंढ निकाला, नाम दिया – Mobile. यह यन्त्र इसलिए भी कारगर था क्योंकि इसमें प्रेम के नाज़ुकपन को समझने की सलाहियत थी और यही वजह थी की इससे, वह बातें जो बोली नहीं जा सकती थीं उन्हें सन्देश रूप में लिख कर भेजने की सुविधा से भी लैस किया गया। जैसा कि मैं पहले भी बता चुका हूँ कि समाज ने ‘प्रेम-विचारधारा’ के प्रचार प्रसार के लिए एक अनुकूल वातावरण बनाया, इसी विषय में mobile companies के सहयोग को भी नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता। ये उनकी दरियादिली ही थी कि उन्होंने सस्ते कॉल रेट, अनलिमिटेड मुफ्त sms और नाईट कालिंग जैसी अनेको सुविधाएं देकर इस ‘प्रेम-विचारधारा’ के अनुयायियों को प्रोत्साहित किया।
हालांकि, ऐसा नहीं है कि इस विषय पर 'राजनीति' ने कोई सहयोग नहीं किया, या हुकूमतें हाथ बांधे कड़ी रहीं और नेता खामोश रहे - नहीं ऐसा बिलकुल नहीं है, बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी इस क्रांति के समर्थन स्वर गूंजने लगे, सरकारों के सहयोग से प्रेमी जोड़ो के लिए 'प्रेम-स्थल' बनवाये गए जिन्हें बाद में बाद में 'पार्क' कहा जाने लगा। लगे हाथों सरकार ने अंतरजातिय जोड़ो को सुरक्षा प्रदान करने का एलान भी कर दिया और तो और सरकारी सीनों की असल नर्म दिली का अंदाज़ा तब लगा जब जोड़ों को बिना विवाह रहने की संवैधानिक अनुमति दे दी गयी। ये एक युग परिवर्तन था, प्रेम-क्रांति के बाग़ी फूलो के खिलने का आगाज़ था जिसने लोगो को अपनी पत्नी में अपनी प्रेमिका ढूंढना सिखाया। इस सामाजिक बदलाव ने पति-पत्नी के रिश्तो को और सुन्दर बनाकर इस रिश्ते के दायरे को महज़, पति के खाना खाने पर पत्नी के पंखा झलने से आगे निकाला। इश्क ने पंख फैलाए और बिना किसी फिक्र के मोहब्बत के आसमान में उड़ान भरने की तैयारी कर ली। वर्तमान समाज ऐसे उदाहरणों से पटा पड़ा है जो इस बात की पुष्टि करते हैं। यकीन न हो तो बिहार के माधेपुर चलिए, यहाँ पर लक्ष्मी देवी नाम का एक मंदिर है, जहाँ हर साल Valentines डे, बल्कि उससे पहले ही बहुत से प्रेमी जोड़े आकर अपने प्यार की कामयाबी की दुआ करते हैं। अब यह भी जान लीजिये की यह मंडित किसने बनवाया। मंदिर बनवाने वाले व्यक्ति का नाम रामेश्वर प्रसाद यादव है, यह स्वयं भी पिछले कई सालो से लक्ष्मी देवी की मूर्ति पर रोज़ाना श्रद्धापूर्वक फूल माला चढ़ाते हैं, लेकिन जान के हैरानी होगी की यह लक्ष्मी देवी कोई और नहीं इन महाशय की पत्नी हैं, जिनका स्वर्गवास कुछ साल पहले हो गया था। जिसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी का एक मंदिर बनवाकर उनकी प्रतिमा भी स्थापित करवाई, जहाँ वो प्रतिदिन नियमपूर्वक पूजा भी करते हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने पत्नी की मूर्ती के साथ अपनी मूर्ती भी लगा रखी है।अब इसे क्या कहेंगे? वैवाहिक बंधन या फिर प्रेम की पराकाष्ठा। इस बारे में कोई दूसरी राय ढूँढने से भी नहीं मिलेगी की यह पति-पत्नी के रिश्ते के आगे बढ़कर एक दुसरे में प्रेमी-प्रेमिका को ढूंढ लाने की एक सच्ची और सफल कोशिश है। प्रेम जब हद्द से गुज़रता है तो समाज नए उदाहरण गढ़ता है, नए नायक ढूंढता है और नयी बात कहता है, जैसा कि रामेश्वर प्रसाद यादव ने कही।
सवाल यह उठता है कि प्रेम में ऐसा कौन सा आकर्षण पैदा किया गया था, जिसकी वजह से समाज के समाज इससे जुड़ते चले गए। एक बहुत बड़े वर्ग का यह भी मानना है कि प्रेम में कला का मिश्रण, प्रेम-वैज्ञानिकों का एक ऐसा फ़ॉर्मूला था जिसने अपना काम तयशुदा समय से पहले ही कर दिखाया। प्रेम और कला का संगम एक मील का पत्थर साबित हुआ। यह अनूठा संगम इतना सुन्दर और आकर्षक था की पुश्तें की पुश्तें इसकी चपेट में आ गयीं। शायरी- गीत- नज़्म-ग़ज़ल साहित्य की हर विधा में इस विषय पर इतना कलम चला की लोग किसी अचार विज्ञापन की बेसलाइन 'चखे बिना रहा ना जाए' को अपनी ज़िन्दगी की सच्चाई सा महसूस करने लगे। मीर ग़ालिब और दाग़ को फिर से खंगाला गया और साहिर-कैफ़ी और मजाज़ जैसे शायरों ने इस सामाजिक क्रांति की आग के लिए इतना ईंधन तैयार कर दिया की लपटें अब तक मद्धम नहीं पड़ी हैं ।
लेकिन ज़रा देख लीजिये - कैसा दुर्भाग्य है की युगों-युगों तक चली इस जंग का ज़िक्र इतिहास की किसी किताब में नहीं है और न ही किसी स्कूली किताब में इस क्रांति के नायको की जीवनी है। मगर शायद ऐसा इसलिए है क्योंकि इस साहित्य का मर्म लाइ्ब्रेरीज़ और स्कूलों से निकल कर समझने लायक है और इस 'नागरिक अधिकार' का प्रयोग खुली हवाओं में किया जाने लायक है, वो कहते हैं ना Love is in the air.
आइये, इस Valentine's दिवस पर प्रणाम करें ज़मानों-पार के उन बिना स्मारक, बिना प्रेरणा स्थल वाले शहीदों को जिन्होंने 'प्रेम' को हम तक पहुँचाया और हमें जीवन में हँसने-रोनें की एक और माक़ूल वजह दी।
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Wednesday, 28 December 2011

एक सौतेली कौम का दर्द



मुल्क के एक कोने से ‘मुस्लिम-मुस्लिम’ आवाज़ आ रही है, चौकना लाज़मी है। यकीन करना मुश्किल है मगर आवाज़ जानी पहचानी है। एक मायूस, बदहवास और पिछड़ी कौम, जिसे सियासत से अगर कुछ हासिल हुआ तो सिर्फ 'हमदर्दी', कैसे यकीन कर ले की सियासी मौसम में ये पुकार उसकी तकदीर बदल सकती है।
‘आरक्षण का नारा’ और ‘चुनाव का वक़्त’ पुराने साथी हैं और इतिहास गवाह है की इनका साथ हमेशा रंग लाया है। लगभग 3 साल पहले अपने मनिफेस्तो में पसमांदा मुसलमानों को आरक्षण का ज़िक्र करने वाली कांग्रेस अब तक सोती क्यों रही या, क्या ये नए सियासी समीकरण गढ़ने की एक नयी कोशिश है ? - पूछा जा सकता है। लेकिन मौक़ा एक कौम की तरक्की से जुड़े सवालों की ज़मीन तलाशने का है तो इस सवाल को नज़र अंदाज़ कर, आगे बढ़ा जा सकता है। किसी राज्य में 18.5% वोट की ताक़त सियासतदाओं को कुछ तो सोचने पर मजबूर करेगी ही, साथ ही तर्क ये भी दिया जा सकता है की, ' चुनाव के वक़्त ही क्यों' से ज्यादा प्रासंगिक 'चुनाव के बहाने ही सही' है - हाँ मगर, इस सियासी फैसले पर किसी की पीठ नहीं थपथपाई जा सकती।
हालांकि, इस मसले पर सियासी भौवें चढ़ना लाज़मी है, क्योंकि उत्तर प्रदेश के कुछ अपने राजनितिक समीकरण हैं जो इस फैसले से बिगड़ सकते हैं आखिर सवाल उस कौम का है जो आज़ादी के बाद से ही वैश्वीकरण के माहौल में, भागते वक़्त के साथ रफ़्तार नहीं मिला सकी और एक बार जो पीछे छूटी तो छूटती ही चली गयी। इस कौम को न सिर्फ गैरों से धोखा मिला बल्कि अपने रहनुमाओं ने भी उलझा कर रख। आज के हालात देखें तो लगता है जैसे ये कौम एक सच्ची और इमानदार रहनुमाई की राह तकते-तकते सो गयी और पीछे छूट गयी, अपने वोट की ताक़त का सही इस्तमाल कभी तो इसने खुद नहीं किया और कभी करने नहीं दिया गया मगर वोट बैंक की फिक्र 5 साल में एक बार ही सही, हुकुमत और सियासत को इनकी तरफ मुस्कुरा कर देखने पर मजबूर कर ही देती है ,
                  “हर मोड़ पर मिल जाते हैं हमदर्द हज़ार, शायद तेरी बस्ती में अदाकार बहुत हैं“
मुस्लिम वोट बैंक जो आज उत्तर प्रदेश की 139 विधान सभा सीटों पर 20% और 40 सीटों पर 50% तक की भागीदारी रखता है, हमेशा उदासीनता का शिकार रहा है । इतिहास भी इससे कुछ ख़ास जुदा नहीं है, 1950 में हिन्दू अनुसूचित जाति आरक्षण के ‘Presidential orders’ के 6 साल बाद भी जब पुनर्विचार हुआ तब भी हाशिये पर पड़ी इस कौम को किसी प्रकार के लाभ से दूर रखा गया, हालांकि सिख-दलितों को सूची में शामिल कर लिया गया। इतिहास 1979 में दोहराया गया, तब तक मुल्क के हालात तो काफी हद तक बदल चुके थे मगर मुस्लिम समाज उसी मोड़ पर खड़ा था जहाँ वो आजादी से पहले अपनी ज़मीन तलाश रहा था मगर एक बार फिर उसे नज़र अंदाज़ कर सिर्फ बौध -दलितों पर ही महेरबानी की गयी, जिसका विरोध उसने कभी नहीं किया ।
आज के हालात चीख-चीख कर मुस्लिम समाज की पसमांदा कौमो के विकास के लिए आर्थिक और सामाजिक मदद की दुहाई दे रहे हैं। ख़ास कर उस वक़्त जब दूसरे मज़ाहिब की पिछड़ी जातियों को इसका लाभ मिल रहा है तब ये सवाल अपने अस्तित्व की तलाश और निष्ठा से करता है की सिर्फ मुस्लिम समाज इससे वंचित क्यों? हालांकि वक़्त बदला है और दबी ज़बान में ही सही इस विषय पर सियासी गलियारों में सुगबुगाहट होने लगी है, जो बेशक अच्छे संकेत है।
मुलायम सिंह यादव की बातें और मायावती की केंद्र को चिट्ठियां इस बात की तस्दीक तो करती हैं की इस फैसले की ज़रुरत है, मगर बुनियादी तौर पर अमली जमा पहनाने के लिए कोई ठोस कोशिश नहीं करता। उनका फ़र्ज़, महज़ पिछड़े मुसलमानों के झंडे को उठाने की औपचारिकता से ही पूरा हो जाता लगता है, मगर हकीकत कहीं उदास है। एक कौम जिसकी आजादी के 64 साल बाद भी आधी से ज्यादा आबादी अनपढ़ और 1/3 बेरोजगार हैं, जो न सिर्फ सामाजिक बल्कि आर्थिक रूप से भी समाज की मुख्य धारा से नहीं जुड़ पाई है, जो अपने विकास के लिए उतनी ही हक़दार है जितनी दूसरी पसमांदा कौमे, जिसके हालात बकौल सच्चर कमेटी दलित से भी ज्यादा खराब हैं, - अब अपना हक मांग रही है तो विरोध के तर्क सही नहीं हो सकते ।
मगर सम्प्रदायिकता से अपने घर चलाने वाली कुछ सियासी पार्टियाँ इसे देश की ‘एकता पर प्रहार’ के रूप में देख रही हैं, उनका कहना है की OBC के 27% आरक्षण में अगर मुस्लिम पसमांदा के लिए 'quota within quota' की व्यवस्था की गयी , तो तय अनुपात बिगड़ जाएगा, जिससे हिन्दू OBC और मुस्लिम OBC के बीच तनाव हो सकता है, हालांकि ये एक कोरी बकवास है बल्कि ये हिन्दू OBC को उकसाने का प्रयास है। चौकाने वाली बात ये है की सांप्रदायिक सौहार्द की फिक्र उस विपक्षी दल को हो रही है जिसकी ‘सांप्रदायिक सौहार्द’ की करतूत 1992 में पूरी दुनिया ने देखा था। इसी राजनीतिक जमात के एक नेता जो मध्य प्रदेश के CM भी थे, सच्चर कमेटी की सिफारिशों के खिलाफ थे - जिनका तर्क था – ‘इससे देश बट जाएगा’ । राजनाथ सिंह जो आगामी चुनाव में अच्छे अंको से पास होने के लिए मेहनत कर रहे हैं , ये कहने से गुरेज़ नहीं करते की 'मुस्लिम OBC आरक्षण दो मज़हब के बीच तनाव बढ़ा सकता है और तो और सियासी मजबूरी की पराकाष्ठा देखिये की, मुख्तार अब्बास नकवी जैसे नेता जो खुद मुस्लिम समाज की ज़मीनी सच्चाई से अच्छी तरह वाकिफ हैं, पार्टी की विचारधारा के दबाव में आव-बाव बक रहे हैं, तर्क उनका भी वही है - 'देश बट जाएगा', मगर कैसे ? इसका जवाब उनकी किसी जेब में नहीं है ।
एक गुज़रे हुए ज़माने में ‘India Shining’ का खोखला नारा गूंजा था, जिसकी पोल खुद बा खुद खुल भी गयी थी। शायद ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि विकास की धारा चौतरफा दिशा में नहीं बही थी और ‘वोट बैंक पोलिटिक्स’ को आधार बना कर भेद-भाव किया गया था। यकीनन मुस्लिम समाज के आज के हालात उस दौर से बेहतर हैं मगर आज फिर से वही लोग उस कौम के रास्ते में खड़े हैं, जो उसका नाम सुनते ही नाक-भौ सिकोड़ने लगते हैं।
         भारतीय संविधान साफ़ तौर पर कहता है की समाज में आरक्षण सिर्फ सामाजिक और आर्थिक  आधार पर हो सकता है, धार्मिक नहीं। ऐसे में मुस्लिम मुआशिरे के आर्थिक और सामाजिक स्तर को नज़र अंदाज़ करके सौतेला व्यवहार क्यों किया जा रहा है ? विरोध के तर्क क्या हैं? जवाबदेही किसकी है? क्या हालात ऐसे ही उलझे रहेंगे? इस कौम के ऐसे ही कुछ मासूम सवालों का जवाब कौन देगा? ये अभी तय होना बाक़ी है लेकिन हुक्मरानो ओर सियासतदारों को ये भी भूलना नहीं चाहिए की बगावत, की रौशिनी ज़ुल्म के अँधेरे को चीरना भी जानती है और तख़्त ओ ताज उछालना भी। 

Thursday, 24 November 2011

वो केक की लिखावट में एक नाम ढूंढता था



उसके जन्मदिन हमेशा वक़्त पर आते थे, किसी अजनबी की तरह, बिना इंतज़ार के. अपने दोस्तों पर उसे फक्र था ... मगर, लाल- पीले गुब्बारे कुछ देर बाद ही उदासी से मुंह लटका लेते और मोमबत्तियां के साथ पर उसे ज्यादा देर भरोसा नहीं था... अँधेरे की दोस्ती पर शक नहीं ... एहसासों से तलाकशुदा लफ्जों में, कहने वाले कहते थे - 'मुबारक हो' और वो किसी रिवाज़ की तरह मुस्कुराता था.. शायद कुछ अधूरा था ? एक एहसास, एक हँसी, शायद एक आंसू या शायद एक नाम ...जिसे वो केक की लिखावट में ढूंढता और सोचता था, की मोहब्बत भी अनदेखी जन्नत की तरह सुनी सुनाई बात है .. और फिर वो उस अजनबी के कंधे पर सर टिका देता, जैसे बसों में बैठे लोग नींद की झोंके में करते हैं ..